गजलकार :- विरेन्द्र कुमार सिंह
१. गजल
आंदोलन करबै हमसभ तहिया धरि
ई, नश्ल्वादी सोंच रहतै जहिया धरि
हमसभ अइठाँ दहाक' कहाँ याल छी
देखैछी ओ उनुस लाडै'हैं कहिया धरि
फिरंगीकेँ नाल देख काटब घुस्कुनिया तँ
घूमब मात्रे ओकर गाड़ीकेँ पहिया धरि
कोर्रा मारि, केन्ना बिसरब मधेशी भाई
चलू पोतैछी करिखा ओक्रा बपहिया धरि
शासक सँ दारू नै अप्न अधिकार छीनू
सीमित नै रहू यारे मात्रे पन्सहिया धरि
२. गजल
ई लाल - लाल धूजा ललकार केकरा लेल
जनते नै रहतै, त’ ई सरकार केकरा लेल
अहीं लेल लोग अत' प्राणक आहूती देल्कै
आब बनल छी आहाँ, खूंखार केकरा लेल
माथमें पट्टी बान्हि कुदलै, ई गरिब'हे बेट्टा
बनल छल दिन-राति क्रांतकार केकरा लेल
आँहाँ त’ भूलि गेलियै, सत्तामें झूलि गेलियै
छोड़ि गेलियै निच्चा, बोखार केकरा लेल
आरि-कोन्ह ढाहि, साँढ़ सन' उपढ़याँह नै करु
दिया'जे देलू मुँहमें, से ई बकार केकरा लेल
अहं नै करू बेसी, छनेमें-छनाक भ' ज्यात
मधेश'क माओवादी भेल, बेकार केकरा लेल
३. गजल
एक-दाेसरमें मुँह दुस्सा-दुस्सी किया भेलै गौ
फर्कल बछरु दूध नै पिल्कै मुन्हीमें कसेलै गाै
राम खेलैछै तीर-धनुहिया एकहु निशाना बाम नए
बाँचिगेलै सुर्पनेखा मुदा ई सिताजी ह'रेलै गाै
हाँस बगरिया हँसिले एकदिन ताेंहूँ फँस्बे यार
गर्दनि काटिक' हमरे साेझा बबाजी लगेलै गाै
रक्क्त सभटा चूबा-चूबाक' तम्घैलामें ताेंहीँ रख्ने
एकहि बुन्न जँ हम चटलियै सभ किये डरेलै गाै
राति-दिन त् ताेंही हँकैछे बैस्ले बैसल गाछकेँ
बिना फुकनहि अइ धामीकेँ भुँत केना परेलै गाै
४. गजल
हमछी सिताकेँ सहोदर भाई, मानैछै दुनियाँ सगरे
ताहीसँ, हमरा मधेशीके यौ, तानैछै दुनियाँ सगरे
आब हम्ही जे अहं करबै, अपने घरकेँ अस्तित्व लूटि
ओहीसँ, हमर मधेशी भैया, कानैछै दुनियाँ सगरे
बुझबै तँ नीकेँ रहब, काबीले रहब, मुदा से केँ बुझतै
अपनेमें लड़ब त' अहिना देखू, हानैछै दुनियाँ सगरे
नून-लस्सा लागल त' बूझू दाईलोमें काला छै किछ
अहिनाक' मधेश फुटौने छै ने, जानैछै दुनियाँ सगरे
जँ सिता, बुद्ध सुनिक' लोग नमन करय मधेशोकेँ, नेताजी !
जेसभ अहं नै करैछै माटि'क, फानैछै दुनियाँ सगरे
५. गजल
गंडक, कोशी, बलान नहेबै यौ
हम आब त' ई, पुराण पढ़ेबै यौ
विद्यापतिकेँ लिखल पोथी हमसभ
घर-घर द'क' आ गुमान बढ़ेबै यौ
सीयाजीकेँ नगरिमें हमसभ छी
भूगोले पर, महान कहेबै यौ
आहौं मानब त' मानू मीताजी
अपनोसे जी, जहान लगेबै यौ
मिलबै त' लिय'न' संगोरे करबै हम
सब भाई मिलक' सान बढ़ेबै यौ